पझौता आंदोलन : सिरमौर के महाराजा राजेंद्र प्रकाश की सेना ने निहत्थे लोगों पर दागी थीं 1700 गोलियां #news4
June 11th, 2021 | Post by :- | 315 Views

राजगढ़ : प्रदेश के इतिहास में पझौता आन्दोलन को स्वतंत्रता संग्राम का एक हिस्सा माना जाता है। 11 जून, 1943 को महाराजा सिरमौर राजेंद्र प्रकाश की सेना द्वारा पझौता आन्दोलन के निहत्थे लोगों पर राजगढ़ के सरोट टिल्ले से 1700 राऊंड गोलियां चलाई गई थीं। इसमें कमना राम गोली लगने से मौके पर ही शहीद हुए थे जबकि तुलसी राम, जाती राम, कमाल चंद, हेत राम, सही राम व चेत सिंह घायल हो गए थे। वैद्य सूरत सिंह के नेतृत्व में इस क्षेत्र के वीर सपूतों ने अपने अधिकार के लिए महाराजा सिरमौर के विरुद्ध आन्दोलन कर रियासती सरकार के दांत खट्टे कर दिए थे। इसी दौरान महात्मा गांधी द्वारा सन् 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन आरंभ किया गया था। इस कारण इस आन्दोलन को देश के स्वतंत्र होने के उपरांत भारत छोड़ो आन्दोलन की एक कड़ी माना गया था। इस कारण पझौता आन्दोलन से जुड़े लोगों को प्रदेश सरकार द्वारा स्वतंत्रता सैनानियों का दर्जा दिया गया था।

राजा ब्रिटिश सेना की कर रहा था मदद

सूत्रों से एकत्रित की गई जानकारी के अनुसार महाराजा सिरमौर राजेन्द्र प्रकाश की दमनकारी एवं तानाशाही नीतियों के कारण लोगों में रियासती सरकार के प्रति काफी आक्रोश था। महाराजा सिरमौर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को सेना और रसद प्रदान कर मदद कर रहे थे। इस कारण रियासती सरकार द्वारा लोगों पर जबरन कर लगाने के अतिरिक्त सेना में भर्ती होने के फरमान जारी किए थे। रियासती सरकार के तानाशाही रवैये से तंग आकर पझौता घाटी के लोग अक्तूबर, 1942 में टपरोली नामक गांव में एकत्रित हुए और पझौता किसान सभा का गठन किया। जबकि आन्दोलन की पूरी कमान सभा के सचिव वैद्य सूरत सिंह के हाथ में थी। पझौता किसान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव को महाराजा सिरमौर को भेजा गया जिसमें बेगार प्रथा को बंद करने, जबरन सैनिक भर्ती, अनावश्यक कर लगाने व दस मन से अधिक अनाज सरकारी गोदामों में जमा करने के फरमान को वापस लेने को कहा गया। महाराजा द्वारा उनकी मांगों पर कोई गौर नहीं किया। बताते हैं कि राजा के चाटुकारों द्वारा समझौता नहीं होने दिया गया, जिस कारण पझौता के लोगों द्वारा बगावत कर दी गई। इसने बाद में एक बड़े आन्दोलन का रूप ले लिया।

आलू का उचित रेट न मिलना था पझौता आन्दोलन का तात्कालिक कारण

पझौता आन्दोलन का तात्कालिक कारण आलू का रेट उचित न दिया जाना था। बताते हैं कि  रियासती सरकार द्वारा सहकारी सभा में आलू का रेट 3 रुपए प्रति मन निर्धारित किया गया जबकि खुले बाजार में आलू का रेट 16 रुपए प्रतिमन था। चूंकि आलू की फसल इस क्षेत्र के लोगों की आय का एक मात्र साधन थी, जिस कारण लोगों में रियासती सरकार के प्रति काफी आक्रोश पनप रहा था। वैद्य सूरत सिंह द्वारा अपनी टीम के साथ गांव-गांव जाकर लोगों को इस आन्दोलन में अपना सहयोग देने बारे अपील की गई और इस आन्दोलन की चिंगारी पूरे पझौता क्षेत्र में फैल गई और लोग रियासती सरकार के विरूद्ध विद्रोह करने पर उतर गए।

कुछ अधिकारियों ने दिया था पद से त्याग पत्र

आन्दोलन के लिए गठित समिति का पहला कदम था राजा द्वारा यहां बनाए गए जेलदारों व नंबरदारों द्वारा अपने पद से त्याग पत्र देना। इसी दौरान जिला में न्यायाधीश के पद से डॉ. वाईएस परमार ने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया। जैसे ही राजा को इस बात की भनक लगी, उन्होंने नाहन से 50 सैनिकों के दल को इस आन्दोलन को कुचलने व समिति के सदस्य को पकडऩे के लिए भेजा। इस दल का नेतृत्व डीएसपी जगत सिंह कर रहे थे। उन्होंने क्षेत्र का दौरा कर नाहन जाकर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। बताते हैं कि इसी दौरान राजा पटियाला चूड़धार की यात्रा के दौरान पझौता क्षेत्र के शाया में रुके थे। उन्होंने इस आन्दोलन का जायजा लिया और राजा सिरमौर को एक पत्र लिखकर इस आन्दोलन को समाप्त करने के लिए उचित कदम उठाने का आग्रह किया। परिणामस्वरूप राजा ने इस आन्दोलन को शांत करने व समझौता करने के लिए रेणुका के बूटी नाथ, नारायण दत्त व दुर्गा दत्त को पझौता क्षेत्र में भेजा। मगर समझौता कराने में यह असफल रहे। उनके बाद राजा ने आन्दोलन समिति के सदस्यों को समझौता करने के लिए नाहन बुलाया। मगर आन्दोलनकारियों ने राजा के आग्रह को ठुकरा दिया।

आन्दोलनकारियों ने पुलिस दल को बंदी बना लिया

अन्तत: महाराजा ने आन्दोलन को कुचलने के लिए पुलिस दल को पझौता घाटी भेजा। 6 मई, 1943 को यह दल राजगढ़ पहुंचा। कुछ आन्दोलनकारियों को राजगढ़ के किले में कैद कर लिया गया। 7 मई, 1943 को कोटी गांव के पास आन्दोलनकारियों व पुलिस के बीच मुठभेड़ हो गई। इसमें आन्दोलनकारियों ने पुलिस दल को बंदी बना लिया। आन्दोलनकारियों ने मांग रखी कि राजगढ़ किले में बंद आन्दोलनकारियों को छोड़ा जाए तभी वे पुलिस दल को छोड़ेंगे। महाराजा ने स्थिति को अनियंत्रित देखते हुए 12 मई, 1943 को पूरे क्षेत्र में मार्शल लॉ लगाने के आदेश जारी कर दिए और समूची पझौता घाटी को सेना के अधीन लाया गया जिसकी कमान मेजर हीरा सिंह को सौंपी गई।

आन्दोलनकारियों ने छोड़ दिए थे घर

सेना द्वारा आन्दोलनकारियों को 24 घंटे में आत्मसमर्पण करने को कहा गया। मगर आन्दोलनकारियों ने साफ  मना कर दिया। उसके बाद सेना ने क्षेत्र में लूटपाट आरंभ कर दी। इसी दौरान सेना द्वारा आन्दोलन के मुखिया वैद्य सूरत सिंह के कटोगड़ा स्थित मकान को डॉइनामाइट से उड़ा दिया गया जबकि एक अन्य आन्दोलनकारी कली राम के घर को आग लगा दी गई। इस सारे प्रकरण को देखते हुए आन्दोलनकारियों ने अपने घर छोड़ दिए व ऊंची पहाडिय़ों पर अपने कैंप बना लिए ताकि वे सेना पर नजर रख सकें। इसको देखते हुए सेना ने भी राजगढ़ के साथ ऊंची पहाड़ी सरोट नामक स्थान पर अपना कैंप बना लिया।

69 आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया

11 जून, 1943 को निहत्थे लोगों का एक दल आन्दोलनकारियों से मिलने जा रहा था। कुफर घार के पास जब यह दल पहुंचा तो सेना ने सरोट के टील्ले से गोलियों की बौछार शुरू कर दी। 2 माह के पश्चात सैनिक शासन और गोलीकांड के बाद सेना और पुलिस द्वारा वैद्य सूरत सिंह सहित 69 आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। नाहन में एक ट्रिब्यूनल गठित कर आन्दोलनकारियों पर 14 महीने तक देशद्रोह के मुकद्दमे चलाए गए और कमेटी के 9 सदस्यों की संपत्ति को कुर्क  कर दिया गया। अदालत के निर्णय में 14 को बरी कर दिया गया। 3 को 2-2 साल और 52 आन्दोलनकारियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इस बीच कनिया राम, विशना राम, कली राम व मोही राम ने जेल में ही दम तोड़ दिया। उसके बाद सिरमौर न्याय सभा के नाम एक न्यायालय की स्थापना की गई। इसमें इस मुकद्दमे को पुन: चलाया गया। इसमें सजा को 10 और 5 वर्ष में परिवर्तित किया गया। इसमें वैद्य सूरत सिंह, मिंया गुलाब सिंह, अमर सिंह, मदन सिंह व कलीकरा आदि को 10 वर्ष की सजा सुना दी गई। 15 अगस्त, 1947 को देश के स्वतंत्र होने पर इस आन्दोलन से जुड़े काफी लोगों को रिहा कर दिया गया जबकि आन्दोलन के प्रमुख वैद्य सूरत सिंह, बस्ती राम पहाड़ी और चेत सिंह वर्मा को सबसे बाद में मार्च 1948 में रिहा किया गया।

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