551वां प्रकाश पर्व:देश के 10 प्रसिद्ध गुरुद्वारे, जहां बरसती है श्री गुरु नानक देव जी की असीम कृपा
November 30th, 2020 | Post by :- | 84 Views

30 नवंबर 2020 दिन सोमवार को सिख धर्म के संस्थापक एवं प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी का 551वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। इन दिन देश दुनिया के विभिन्न गुरुद्वारों में समागम आयोजित किए जाते हैं। नगर कीर्तन निकाले जाते हैं, जिनमें सिख संगत की अटूट आस्था देखने को मिलती है। श्री गुरु नानक देव जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक देव जी की जयंती पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है।

श्री गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 में तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था। बाद में तलवंडी का नाम ननकाना साहिब पड़ा, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है। गुरु नानक देव जी के पिता का नाम कल्यानचंद या मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता देवी था। इनकी एक बहन थीं, जिनका नाम नानकी था। पत्नी का नाम सुलक्षिनी था, वह बटाला की रहने वाली थीं। उनके दो बेटे थे, एक बेटे का नाम श्रीचंद और दूसरे बेटे का नाम लक्ष्मीदास था।

आइए गुरु नानक देव जी की जयंती पर जानते हैं, भारत में मौजूद 10 ऐसे गुरुद्वारों के बारे में, जहां उनकी असीम कृपा बरसती है और जिनमें सिख धर्म के अनुयायियों की गहरी आस्था है……….

स्वर्ण मंदिर, पंजाब

पंजाब के अमृतसर में बना स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारा श्री हरमंदिर साहिब सिंह के नाम से भी जाना जाता है। यह गुरुद्वारा शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है। पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है। यह सिख धर्म से जुड़ा धार्मिक स्थल है, लेकिन इसके नाम में मंदिर आता है। इस गुरुद्वारे की नींव एक मुस्लिम ने रखी थी। इतिहास के मुताबिक सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी ने लाहौर के एक सूफी संत साईं मियां मीर जी से दिसंबर, 1588 में गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी। लगभग 400 साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद गुरु अर्जुन देव जी ने तैयार किया था। गुरुद्वारे के चारों ओर दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) में खुलते हैं। स्वर्ण मंदिर सरोवर में मानव निर्मित झील है, जहां श्रद्धालु स्नान करते हैं। यह झील मछलियों से भरी हुई है। मंदिर से 100 मी. की दूरी पर स्वर्ण जड़ि‍त, अकाल तख्त है। इसमें एक भूमिगत तल है और पांच अन्य तल हैं। इसमें एक संग्रहालय और सभागार है। यहां पर सिख पंथ से जुड़ी हर समस्या का समाधान किया जाता है।

श्री हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा

सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस गुरुद्वारे का निर्माण किया था। यह उनकी तपोस्थली है। यह गुरुद्वारा उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है और सिखों का पवित्र धार्मिक स्थल है। चारों तरफ से पथरीले पहाड़ और बर्फ से ढंकी चोटियों के बीच बसा हेमकुंड साहिब समुद्र तल से 4329 मीटर की ऊंचाई पर है। मान्यता है कि यहां श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने बरसों महाकाल की आराधना की थी। यही वजह है कि सिख समुदाय की इस तीर्थ में अटूट आस्था है और वे तमाम दिक्कतों के बावजूद यहां पहुंचते हैं। श्री हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा 6 महीने तक बर्फ से ढका रहता है। गुरुद्वारे के पास ही एक सरोवर है। इस पवित्र जगह को अमृत सरोवर अर्थात अमृत का तालाब कहा जाता है। यह सरोवर लगभग 400 गज लंबा और 200 गज चौड़ा है। यह चारों तरफ से हिमालय की सात चोटियों से घिरा हुआ है। इन चोटियों का रंग वायुमंडलीय स्थितियों के अनुसार अपने आप बदल जाता है। कुछ समय वे बर्फ सी सफेद, कुछ समय सुनहरे रंग की, तो कभी लाल रंग की और कभी-कभी भूरे नीले रंग की दिखती हैं।

शीशगंज गुरुद्वारा, दिल्ली

देश की राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक में स्थित गुरुद्वारे शीशगंज को बघेल सिंह ने सिख धर्म के नौवें सिख गुरु तेग बहादुर की शहादत की याद में बनवाया था। यह वही स्थान है, जहां बादशाह औरंगजेब ने सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर के इस्लाम स्वीकार न करने पर उनकी हत्या करवा दी थी। इसके निर्माण की नींव बघेल सिंह ने 1783 में डाली थी। 11 मार्च 1783 में सिख मिलिट्री के लीडर बघेल सिंह अपनी सेना के साथ दिल्ली आए। वहां उन्होंने दीवान-ए-आम पर कब्जा कर लिया। इसके बाद मुगल बादशाह शाह अलाम द्वितीय ने सिखों के ऐतिहासिक स्थान पर गुरुद्वारा बनाने की बात मान ली और उन्हें गुरुद्वारा बनाने के लिए रकम दी। 8 महीने के समय के बाद 1783 में शीश गंज गुरुद्वारा बना। इसके बाद कई बार मुस्लिमों और सिखों में इस बात का झगड़ा रहा कि इस स्थान पर किसका अधिकार है। लेकिन ब्रिटिश राज ने सिखों के पक्ष में निर्णय दिया। गुरुद्वारा शीश गंज 1930 में पुर्नव्यवस्थित हुआ।

फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा, पंजाब

फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा साहिबजादा फतेह सिंह और जोरावर सिंह की शहादत की याद में बनवाया गया था। यह गुरुद्वारा वास्तुकला का एक नायाब नमूना है। यहां पर गुरु गोविंद सिंह के दो बेटों साहिबजादा फतेह सिंह और साहिबजादा जोरावर सिंह को सरहिंद के तत्कालीन फौजदार वजीर खान ने दीवार में जिंदा चुनवा दिया था। क्योंकि दोनों ने धर्म परिवर्तन करने से इनकार कर दिया था। गुरुद्वारा के अंदर परिसर में कई प्रसिद्ध संरचनाएं हैं, जैसे गुरुद्वारा भोरा साहिब, गुरुद्वारा बुर्ज माता गुजरी, गुरुद्वारा शहीद गंज, टोडरमल जैन हॉल एवं सरोवर। प्रवेशद्वार सफेद पत्थर से बनाया गया है और यह संगमरमर से बने एक सफेद रास्ते की ओर ले जाता है। गुरुद्वारे का मुख्य विशिष्ट सिख वास्तुकला का नमूना है, जिसमें सफेद पत्थर की संरचनाएं व स्वर्ण गुंबद है।

बंगला साहिब गुरुद्वारा, दिल्ली

यह गुरुद्वारा नई दिल्ली के बाबा खड़गसिंह मार्ग पर स्थित है। इस गुरुद्वारे का निर्माण राजा जय सिंह ने करवाया था। सिखों के आठवें गुरु हरकिशन सिंह के द्वारा यहां पर किए गए चमत्कारों की याद में यह गुरुद्वारा काफी प्रसिद्ध है। सिखों और हिन्दुओं दोनों के लिए यह एक पवित्र स्थान है। गुरुद्वारा बंगला साहिब कभी दिल्ली में राजा जय सिंह (जयपुर) का बंगला हुआ करता था। राजा जयसिंह ने सिखों के 8वें गुरु श्री हर किशन सिंह की मेहमान-नवाजी इसी बंगले में की थी। 6 अक्टूबर 1661 को उनका स्वर्गवास हुआ था। गुरुद्वारा बंगला साहिब में राजा जय सिंह ने एक छोटा-सा तालाब बनवाया था। इसका पानी कई बीमारियों के इलाज में कारगर माना जाता है। खास बात यह है कि 225 गुणा 235 फीट का तालाब भक्तों के चंदे से बना है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति ने गुरुद्वारा बंगला साहिब में एक हॉस्पिटल बनवाया। पास ही के भवन में खालसा गर्ल्स स्कूल भी है।

हजूर साहिब गुरुद्वारा, महाराष्ट्र

हजूर साहिब गुरुद्वारा महाराष्ट्र के नांदेड नगर में गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। इसी स्थान पर सन 1708 में गुरु गोविंद सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था। महाराजा रणजीत सिंह ने बाद में इस गुरुद्वारे का निर्माण किया था। ‘हजूर साहिब सचखंड गुरुद्वारा’ विश्व भर में प्रसिद्ध है। गुरु गोविंद सिंह जी ने धर्म प्रचार के यहां अपने कुछ अनुयायियों के साथ पड़ाव डाला था, इसी दौरान सरहिंद के नवाब वजीर शाह ने अपने दो आदमी भेजकर उनकी हत्या करवा दी थी। ऐसा कहा जाता है कि यह हत्या धार्मिक तथा राजनैतिक कारणों से कराई गई थी। अपनी मृत्यु को समीप देखकर गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी अन्य को गुरु चुनने के बजाय सभी सिखों को आदेश दिया कि मेरे बाद आप सभी पवित्र ग्रन्थ को ही गुरु मानें। इस आदेश के बाद से ही पवित्र ग्रन्थ को ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ कहा जाता है।

पांवटा साहिब गुरुद्वारा, हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित इस गुरुद्वारे में श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने जीवन के चार साल बिताए थे और दसवें ग्रंथ की रचना की थी। उन्हीं की याद में यहां गुरुद्वारा बनाया गया है। यहां हजारों पर्यटक हर वर्ष आते हैं। आज भी यहां गुरू गोबिंद सिंह जी की कलम इत्यादि सामान मौजूद है। जिन्हें दर्शन हेतु म्यूजियम में रखा गया है। सिख समुदाय में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति इस गुरुद्वारे में दर्शन के लिए जाना चाहता है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति अपनी मुराद लेकर पहुंचता है गुरु गोबिंद सिंह जी की कृपा से उसकी मुराद जल्द ही पूरी होती है। लोक कथाओं के अनुसार कि यहाँ पर शोर के साथ बहती यमुना नदी गुरु के अनुरोध पर शांति से बही जिससे वे पास बैठकर दसम् ग्रंथ लिख सके। तब से नदी शांति से इस क्षेत्र में बहती है। गुरुद्वारा के अंदर श्री तालाब स्थान वह जगह है, जहाँ से गुरु गोबिंद सिंह वेतन वितरित करते थे। इसके अलावा, गुरुद्वारे में श्री दस्तर स्थान मौजूद है जहां माना जाता कि वे पगड़ी बांधने की प्रतियोगिताओं में न्याय करते थे। गुरुद्वारा का एक अन्य आकर्षण एक संग्रहालय है जो गुरु के उपयोग की कलम और अपने समय के हथियारों को दर्शाती है।

तख़्त श्री दमदमा साहिब, पंजाब

तख्त श्री दमदमा साहिब सिक्खों के पवित्र पांच तख्तों में से एक है। यह गुरुद्वारा पंजाब के बठिंडा में दक्षिण-पूर्व के तलवंडी साबों गांव में स्थित है। गुरु गोविंद सिंह जी यहां आकर रुके थे और यहां आकर उन्होंने मुगलों का सामना किया था। इसी स्थान पर सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब जी के पूर्ण संस्करण को तैयार किया था। जब गुरु गोबिंद सिंह जी 15 हफ्ते यहां रहने के बाद आगे बढ़ने के लिए इस जगह को छोड़ रहे थे, तब उन्होंने इस जगह को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति यहां सच्चे मन से आएगा, उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। उन्होंने इस जगह को गुरु की काशी कहकर आशीर्वाद दिया इसलिए इस जगह को गुरु की काशी भी कहा जाता है। सिख इतिहास के मुताबिक जब गुरु गोबिंद सिंह जी युद्ध और मुश्किल हालातों से लड़ते हुए तलवंडी साबों पहुंचे तो यहां आकर उन्होंने अपने कमर पर बंधे कमरकस्से को खोलते हुए एक लंबी सांस (दम) ली और आराम किया जिसके बाद इस जगह का नाम दमदमा साहिब रखा गया।

श्री पटना साहिब गुरुद्वारा, बिहार

सिख इतिहास में पटना साहिब का विशेष महत्व है। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह का जन्म यहीं 5 जनवरी, 1666 को हुआ था और उनका संपूर्ण बचपन भी यहीं गुजरा था। यही नहीं सिखों के तीन गुरुओं के चरण इस धरती पर पड़े हैं। इस कारण देश व दुनिया के सिख संप्रदाय के लिए पटना साहिब आस्था, श्रद्धा का बड़ा और पवित्र केंद्र व तीर्थस्थान हमेशा से है। महाराजा रणजीत सिंह ने इसका पुनर्निर्माण 1837-39 के बीच कराया था। यहां आज भी गुरु गोबिंद सिंह की वह छोटी कृपाण है, जो बचपन में वे धारण करते थे। यहां आने वाले श्रद्धालु उस लोहे की छोटी चक्र को, जिसे गुरु बचपन में अपने केशों में धारण करते थे तथा छोटा बघनख खंजर, जो कमर-कसा में धारण करते थे, के दर्शन करना नहीं भूलते। गुरु तेग बहादुर जी महाराज जिस चंदन की लकड़ी के खड़ाऊं पहना करते थे, उसे भी यहां रखा गया है, जो श्रद्धालुओं की श्रद्धा से जुड़ा है। गुरुद्वारे की चौथी मंजिल में पुरातन हस्तलिपि और पत्थर के छाप की पुरानी बड़ी गुरु ग्रंथ साहिब की प्रति को सुरक्षित रखा गया है, जिस पर गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज ने तीर की नोक से केसर के साथ मूल मंत्र लिखा था।

गुरुद्वारा मणिकरण साहिब, हिमाचल प्रदेश
मणिकरण गुरुद्वारा को लेकर ऐसी मान्यता है कि सिखों के पहले गुरु नानकदेव ने इसी स्थान पर ध्यान लगाया था। यह पहाड़ियों के बीच बना बहुत सुंदर गुरुद्वारा है। मणिकरण साहिब हिमाचल प्रदेश राज्य के कुल्लू जिले में पार्वती नदी के किनारे पार्वती घाटी में स्थित सिखों और हिंदुओं दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में जाना जाता है। यहाँ के गर्म झरने, धार्मिक प्रवृत्तियां और खूबसूरत वातावरण पर्यटकों को बेहद आकर्षित करता है। कई मंदिरों की संख्या और गुरुद्वारा, मणिकरण साहिब इस जगह को एक धार्मिक स्थान बनाते हैं। हिन्दुओं का मानना है कि भगवान शिव और देवी पार्वती लगभग 1100 वर्षों तक यहाँ पर रहे थे और सिखों के अनुसार, गुरु नानक जी ने यहां कई चमत्कार किए थे।

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